बाल विवाह आज भी जारी है.....

on बुधवार, 1 सितंबर 2010

बचपन खोया सिंदूर के रंगों में .......
खेल खिलौने पढना लिखना,
सब छूटा इस बचपन में ....
धमा चौकड़ी उछल कूद,
खोया सिंदूर के रंगों में....

हुई पराई सब अनजाना,
देखो मेरे इन आँखों में....
घर के चौके घर के चूल्हे,
खेल बने अब आँगन में ......

तुमसे बस इतना मै पुछू,
ये सजा दिया क्यों बचपन में
क्या लौटा पाओगे तुम ,
मुझको मेरे बचपन में....?????